Sunday, May 6, 2012

छात्रों द्वारा आत्महत्या : एक ज्वलंत प्रश्न


शिक्षा प्रणाली की खामियां उजागर होती है ,लगातार छात्रों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं से !
कहीं गाइड ,कहीं हेड ऑफ़ डिपार्टमेंटद्वारा दी गयी मानसिक यातनाएं
,दबाब के चलते हर वर्ष कितने होनहार छात्र ,मेडिकल, इंजीनियरिंग पढाई करते हुए आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो जाते है

इसी मुद्दे पर बनी थी फिल्म ' थ्री इदिअट्स ' की कहानी आधारित थी जहाँ कॉलेज प्रशासन , मानसिक और आर्थिक स्तिथि को समझने से ज्यादा अपने कॉलेज की झूठी इज्ज़त की अधिक परवाह थी.साथ ही व्यवहारिकऔर उद्देश्य परक शिक्षापर ध्यान आकर्षित किया गया था न कि किताबीज्ञान और रटंत विद्या पर! कोई भी संस्था ,कॉलेज की इज्ज़त उस में पढ़ रहे छात्रों की जिन्दगी से बड़ी कैसे हो जाती है.हर छात्र की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्तिथि अलग -अलग होती है उसी के आधार पर उसके साथ व्यवहार किया जाना चाहिए व रियायत देनी चाहिए क्योंकि कोई भी नियम, कानून जिंदगी से बड़ा नहीं हो सकता

इसमें दोष तो कुछ हद तक आज के वातावरण का भी है जहाँ माँ-बाप ,अविभावक भी भौतिकवाद की दौड़ में में मशीनी जिंदगी जी रहे हैं ,बच्चों को स्कूल ,कॉलेज, संस्थानों में भेज कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं उन्हें लगता है फीस और जेबखर्च दिया जाना ही काफी है.माँ-बाप,बच्चों के बीच बढती संवादहीनता और घटती समझदारी समयाभाव ने समाज में इस तरह की घटनाओं में जबरदस्त वृद्धी की है
बाहर कहीं ,अपनों से दूर छात्रावास में पढ़ रहे छात्रों को अजनबी वातावरण और पढाई के दबाब अपने आत्मविश्वास और हिम्मत को बनाये रखने हेतु अपने माँ बाप व् अपनों का संबल बहुत जरूरी है पर कामकाजी माँ -बाप ,बढती संवादहीनता ,समयाभाव छत्रो को निराशाजनक स्तिथियों में लाकर खड़ा कर देता है और वे अपनी भावनाओं को किसी से साँझा नही कर पाते , नितांत अकेलापन उसे अवसाद की ओर धकेलता है और वे आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाते हैं
आज एक ज्वलंत प्रश्न है, ये मेधावी छात्र मेहनत और प्रतिस्पर्धा के बाद किसी टॉप ,कॉलेज,संस्थाओं में प्रवेश पाते हैं बाद उनके द्वारा उठाए जाने वाला आत्मघाती कदम ,कॉलेज प्रशासन ,शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है क्यों न समय रहते हम हो जाये सचेतऔर ऐसे मेधावी छात्र जो समाज में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकते थे , के आत्मघाती क़दमों को रोके

अनुपमा श्रीवास्तव (अनुश्री) भोपाल

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