' प्रकृति से तारतम्य '
क्यों न थोड़ी देर ठहरें ,संभलें और सोचें हम,थोडा वक़्त निकालें अपने लिए, अपनों के लिए.
आपाधापी,दौडभाग में बच्चों से लेकर जवान बूढ़े भी शामिल हैं आज , लेकिन थोडा सोचना है कि कंक्रीट में हरियाली कहाँ! उसे तो खोजना पड़ेगा प्रकृति है जहाँ .प्रकृति माँ की गोद कितनी शांति प्रदायनी है ,सुखदायक है ,इसे जानने के आज वक़्त किसी के पास है कहाँ!
कोई पंद्रह साल से, कोई बीस ,कोई पचीस ,चालीस ,पचाससालों से इस धरती पर अवतरित हो चुका है तो धरती को गौर से देखा !प्रकृति के अनगिनित रूपों को महसूस किया, सराहा है!उसकी छवि को आँखों से दिल में उतारा है !फूलों के साथ मन भी खिला है !चिड़ियों के साथ चहका , खुशबुओं में बहका! ओस की ताजगी भरी छुअन ,पहली बूंदों की सिहरन ,हरी-हरी पतियों की सुगबुगाहट और फूलों की प्रस्फुटन
में डूबा है मन ! क्या चाँद की चाँदनी के साथ चढ़ा और उतरा है नेह का बंधन ! क्या हुआ है कभी मन की प्रकृति और बाहरी प्रकृति का संगम !
सुबह की रोशन शुरुआत , प्रार्थना के शब्दों के साथ,प्रकृति की ताजगी भरी मीठी सी छुअन,अर्धनिमीलित आँखों को गुदगुदा कर जगाती है .ठंडी -ठंडी हवाएं और उड़ते पखेरुओं का सुरीला कलरव, कितना प्यारा होता है ये सब महसूस करने का अनुभव, हम होते है उस विस्तृत ,और व्यापक के करीब, जब होते हैं प्रकृति के समीप
तो प्रकृति से हमारा तारतम्य ,खुद से खुद को जोड़ने का ही है एक उपक्रम ,हमें गर पानी है सुकून और शांति ,तो प्रकृति के समीप होना होगा ,उसे खुद से और खुद को उससे जोड़ना होगा ,प्रकृति को अपने जीवन में जगह दें और उससे तारतम्य बनाये रखें , कहीं भी कार्यस्थल हो या घर प्रकृति से जुड़े रहें हर पल. ऑफिस की दीवालें और टेबल पर हमेशा खूबसूरत फूलों को सजाएं ,दिमागी तनाव, उलझन और थकान दूर करती है फूलों की मुस्कान ,उनसे जिंदगी को हमेशा तरोताजा रखें और प्रकृति को हमेशा अपने करीब पाएं
सुनहरी शामें , आसमान पर रंगबिरंगे बादलों की सवारी , कितनी सुंदर कायनात और उस जादूगर की अभूतपूर्व चित्रकारी .प्रकृति की सुन्दरता बिखरी है हर जगह ,बस जरूरी है उसे देखने की नजर और थोडा समय,जरा थके हुए तन और मन को थोडा सा मिले प्रकृति का दुलार और संबल ,फिर पुरजोश और ताजगी से हो जायेंगे भरपूर
प्रकृति मैं फैली खुशबुओं को तेज सांसें भरकर खुद में उतार लीजिये ,प्रकृति के इस अद्भुत खजाने से कुछ हसीन लम्हे चुरा लीजिये ,आधुनिकता, के इस दौर ने कर दी है इंसान की प्रकृति से दुरी ,सारी मानसिक और शारीरिक बीमारियों ,अस्वस्थता इसी वजह से हुई है क्यों न हम अपने जड़ मन को प्रकृति की चेतना ,गतिशीलता, रागात्मकता में प्रवाहित कर दें और अनुभूतियों के गहन संसार में उतरकर तन,मन और आत्मा से जुड़ जायें!और पा जाये शांति सुकून और स्वस्थ जीवन .

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