Monday, May 14, 2012


नगर निगम की सफाई व्यवस्थाकितनी उचित और आधुनिक!!
नगर निगम  द्वारा  सफाई व्यवस्था  किस तरह और किन तरीकों से की जा रही है ये देख कर आश्चर्य और दुःख भी है .इतने आधुनिक समाज में किन तरीकों से सफाई कराई जा रही है कि लगता ही नहीं कि हम आधुनिक समाज में रह रहे है नगर निगम द्वारा शहर में जगह जगह पर जो  कचड़े के कंटेनर्स  रखे गए हैं उनको खाली  करके के पोलीथिन  बैग  में भरवाया जा रहा है ताकि उन्हें  नगर निगम गाड़ियों में डाला जा सके. इस काम के लिए नगर निगम ने बहुत सारी महिलाओं और बच्चों को थोड़े थोड़े पैसे कि लालच देकर लगा रखा है .ये  महिलाएं और बच्चे अत्यन्त  गरीब और दयनीय हालत में  से कचड़ा खाली करने में लगे हुए हैं.इन्हें किसी भी तरह का सामान  या वस्तु   कचड़ा निकालने हेतु नहीं दिया गया है और ना ही इन्होंने दस्ताने पहने  हुए है..ये महिलाएं, बच्चे अपने हाथों से इतनी  गन्दगी निकाल रहे हैं जो कि बहुत अस्वास्थ्कर और दुखद है  ,महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य    के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है

                                                                                             बच्चों को भी इस काम में लगाया गया है जो कि बल श्रम के भी खिलाफ हैगैर कानूनी है  हर में जगह - जगह पर इस तरह के सीन  देखे  जा सकते हैं  .ये कितना अशोभनीय और अन्यायपूर्ण है बच्चों और महिलाओं को इस तरह के कामों में लगानानगर निगम के पास इतना फंड   आता है तो वो कंटेनर्स खाली करवाने ले लिए किस आदिम बाबा के ज़माने के तरीकों का इस्तेमाल कर रहा है!साथ ही महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ है 

नगर निगम को चाहिए  कि महिलाओं और बच्चों तुरंत इस काम से महिलाओं और बच्चों को हटाना चाहिए .हम इतने आधुनिक समाज में है कि कई तरह के तरीके अपनाए जा सकते है इन कंटेनर्स को खाली करने के लिएपहले भी कई पत्रों द्वारा नगर -निगम का ध्यान इस और आकर्षित  किया गया है पर इस और कोई कार्यवाही नहीं कि गयी है अब तक!   ये अत्यन्त शर्मनाक है महिलाओं और बच्चों से इस तरह कचड़े  से भरे हुए कंटेनर खाली करवाना हिंदुस्तान  की खराब   व्यवस्थाभ्रष्टाचार   ,  महिलाओं और बच्चों का शोषण   और ज्यादतियों को दिखता है और बल श्रम कानून का भी मजाक उडाता हैसाथ ही वैश्विक  स्तर पर भारत की छवि दुनिया के सामने ख़राब   करता है.जहाँ भारत आधुनिक संसाधनों में इतनी तरक्की कर रहा है वहां इस तरह की सफाई व्यवस्था   पर कितने सारे सवाल उठाये जा सकते है !

              
अनुपमा श्रीवास्तव (अनुश्री) भोपाल(.प्र)
                                                                          


 
                                                                                                                                   

Sunday, May 6, 2012

छात्रों द्वारा आत्महत्या : एक ज्वलंत प्रश्न


शिक्षा प्रणाली की खामियां उजागर होती है ,लगातार छात्रों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं से !
कहीं गाइड ,कहीं हेड ऑफ़ डिपार्टमेंटद्वारा दी गयी मानसिक यातनाएं
,दबाब के चलते हर वर्ष कितने होनहार छात्र ,मेडिकल, इंजीनियरिंग पढाई करते हुए आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो जाते है

इसी मुद्दे पर बनी थी फिल्म ' थ्री इदिअट्स ' की कहानी आधारित थी जहाँ कॉलेज प्रशासन , मानसिक और आर्थिक स्तिथि को समझने से ज्यादा अपने कॉलेज की झूठी इज्ज़त की अधिक परवाह थी.साथ ही व्यवहारिकऔर उद्देश्य परक शिक्षापर ध्यान आकर्षित किया गया था न कि किताबीज्ञान और रटंत विद्या पर! कोई भी संस्था ,कॉलेज की इज्ज़त उस में पढ़ रहे छात्रों की जिन्दगी से बड़ी कैसे हो जाती है.हर छात्र की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्तिथि अलग -अलग होती है उसी के आधार पर उसके साथ व्यवहार किया जाना चाहिए व रियायत देनी चाहिए क्योंकि कोई भी नियम, कानून जिंदगी से बड़ा नहीं हो सकता

इसमें दोष तो कुछ हद तक आज के वातावरण का भी है जहाँ माँ-बाप ,अविभावक भी भौतिकवाद की दौड़ में में मशीनी जिंदगी जी रहे हैं ,बच्चों को स्कूल ,कॉलेज, संस्थानों में भेज कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं उन्हें लगता है फीस और जेबखर्च दिया जाना ही काफी है.माँ-बाप,बच्चों के बीच बढती संवादहीनता और घटती समझदारी समयाभाव ने समाज में इस तरह की घटनाओं में जबरदस्त वृद्धी की है
बाहर कहीं ,अपनों से दूर छात्रावास में पढ़ रहे छात्रों को अजनबी वातावरण और पढाई के दबाब अपने आत्मविश्वास और हिम्मत को बनाये रखने हेतु अपने माँ बाप व् अपनों का संबल बहुत जरूरी है पर कामकाजी माँ -बाप ,बढती संवादहीनता ,समयाभाव छत्रो को निराशाजनक स्तिथियों में लाकर खड़ा कर देता है और वे अपनी भावनाओं को किसी से साँझा नही कर पाते , नितांत अकेलापन उसे अवसाद की ओर धकेलता है और वे आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाते हैं
आज एक ज्वलंत प्रश्न है, ये मेधावी छात्र मेहनत और प्रतिस्पर्धा के बाद किसी टॉप ,कॉलेज,संस्थाओं में प्रवेश पाते हैं बाद उनके द्वारा उठाए जाने वाला आत्मघाती कदम ,कॉलेज प्रशासन ,शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा कर रहा है क्यों न समय रहते हम हो जाये सचेतऔर ऐसे मेधावी छात्र जो समाज में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकते थे , के आत्मघाती क़दमों को रोके

अनुपमा श्रीवास्तव (अनुश्री) भोपाल

Wednesday, May 2, 2012

' प्रकृति से तारतम्य '

आधुनिक जिंदगी की तेज रफ़्तार और तेजी से दौड़ते छोटे ,बड़े कदम, कभी -कभी बेबस होकर सोचते हैं हम कहाँ भागे जा रहे हैं!
क्यों न थोड़ी देर ठहरें ,संभलें और सोचें हम,थोडा वक़्त निकालें अपने लिए, अपनों के लिए.
आपाधापी,दौडभाग में बच्चों से लेकर जवान बूढ़े भी शामिल हैं आज , लेकिन थोडा सोचना है कि कंक्रीट में हरियाली कहाँ! उसे तो खोजना पड़ेगा प्रकृति है जहाँ .प्रकृति माँ की गोद कितनी शांति प्रदायनी है ,सुखदायक है ,इसे जानने के आज वक़्त किसी के पास है कहाँ!


कोई पंद्रह साल से, कोई बीस ,कोई पचीस ,चालीस ,पचाससालों से इस धरती पर अवतरित हो चुका है तो धरती को गौर से देखा !प्रकृति के अनगिनित रूपों को महसूस किया, सराहा है!उसकी छवि को आँखों से दिल में उतारा है !फूलों के साथ मन भी खिला है !चिड़ियों के साथ चहका , खुशबुओं में बहका! ओस की ताजगी भरी छुअन ,पहली बूंदों की सिहरन ,हरी-हरी पतियों की सुगबुगाहट और फूलों की प्रस्फुटन
में डूबा है मन ! क्या चाँद की चाँदनी के साथ चढ़ा और उतरा है नेह का बंधन ! क्या हुआ है कभी मन की प्रकृति और बाहरी प्रकृति का संगम !
सुबह की रोशन शुरुआत , प्रार्थना के शब्दों के साथ,प्रकृति की ताजगी भरी मीठी सी छुअन,अर्धनिमीलित आँखों को गुदगुदा कर जगाती है .ठंडी -ठंडी हवाएं और उड़ते पखेरुओं का सुरीला कलरव, कितना प्यारा होता है ये सब महसूस करने का अनुभव, हम होते है उस विस्तृत ,और व्यापक के करीब, जब होते हैं प्रकृति के समीप


तो प्रकृति से हमारा तारतम्य ,खुद से खुद को जोड़ने का ही है एक उपक्रम ,हमें गर पानी है सुकून और शांति ,तो प्रकृति के समीप होना होगा ,उसे खुद से और खुद को उससे जोड़ना होगा ,प्रकृति को अपने जीवन में जगह दें और उससे तारतम्य बनाये रखें , कहीं भी कार्यस्थल हो या घर प्रकृति से जुड़े रहें हर पल. ऑफिस की दीवालें और टेबल पर हमेशा खूबसूरत फूलों को सजाएं ,दिमागी तनाव, उलझन और थकान दूर करती है फूलों की मुस्कान ,उनसे जिंदगी को हमेशा तरोताजा रखें और प्रकृति को हमेशा अपने करीब पाएं


सुनहरी शामें , आसमान पर रंगबिरंगे बादलों की सवारी , कितनी सुंदर कायनात और उस जादूगर की अभूतपूर्व चित्रकारी .प्रकृति की सुन्दरता बिखरी है हर जगह ,बस जरूरी है उसे देखने की नजर और थोडा समय,जरा थके हुए तन और मन को थोडा सा मिले प्रकृति का दुलार और संबल ,फिर पुरजोश और ताजगी से हो जायेंगे भरपूर


प्रकृति मैं फैली खुशबुओं को तेज सांसें भरकर खुद में उतार लीजिये ,प्रकृति के इस अद्भुत खजाने से कुछ हसीन लम्हे चुरा लीजिये ,आधुनिकता, के इस दौर ने कर दी है इंसान की प्रकृति से दुरी ,सारी मानसिक और शारीरिक बीमारियों ,अस्वस्थता इसी वजह से हुई है क्यों न हम अपने जड़ मन को प्रकृति की चेतना ,गतिशीलता, रागात्मकता में प्रवाहित कर दें और अनुभूतियों के गहन संसार में उतरकर तन,मन और आत्मा से जुड़ जायें!और पा जाये शांति सुकून और स्वस्थ जीवन .











Tuesday, May 1, 2012

विज्ञापन और होर्डिंग्स में अश्लील प्रदर्शन


विज्ञापन और होर्डिंग्स में अश्लील प्रदर्शन
आधुनिक संचार माध्यम का उपयोग जहां बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है वही गलत सोच और द्रष्टिकोण की वजह से सस्ते और अश्लील प्रदर्शन को भी बढ़ावा मिला है आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल महिलाओं के प्रति अपराधों को बढ़ा रहा है तकनीक का प्रयोग अभद्रता और दुष्कर्म के प्रचार-प्रसार के लिए किया जा रहा है .कितनी शर्म की बात है ,इन दुष्कर्मों के mms भी प्रचारित कर दिए जाते हैं चेंनल्स के माध्यमों से विज्ञापन , होर्डिंग्स और इन्टरनेट से समाज में जो नग्नता और फूहड़ता प्रसारित हो रही है,ये उसी का असर है ये वो पैसे के लोभी ,शिकारी रईसजादे है जो नग्नता और फूहड़ता बेचकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं और समाज में गन्दगी परोस रहे हैं प्रशासन को इसे प्रोग्राम और विज्ञापन जो नारी की गरिमा के खिलाफ है ,तुरंत बंद कर देना चाहिए .इन्ही प्रसारणों, होर्डिंग्स और विज्ञापनों की वजह से आज मानव मूल्य ध्वस्त हो रहे हैं


हमारी सभ्यता और संस्कृति को धता बता कर नवयुवक सारी हदें पार कर रहे हैं महिलाएं आज पढ़ी-लिखी हैं ,नौकरी पेशा भी हैं फिर भी उनको भोग्या समझ कर ही समाज में इन संचार साधनों के माध्यम से प्रचार -प्रसार किया जा रहा है , जो की उनकी अस्मिता और आत्मस्वाभिमान के विरूद्ध है. आईटम सोंग्स ,शीला, मुन्नी ,रजिया, अनारकली आदि अश्लील गीतों देकर समाज में अनैतिकता और अश्लीलता को बढ़ावा मिला है

संचार माध्यम, विज्ञापन , बाज़ार और उपभोक्ताओं के के बीच की प्रबल और सीढ़ी कड़ी हैं. जिनके माध्यम से बाज़ार उत्पादों की पकड़ ,जनता तक बनाता है और प्रत्यक्ष रूप से उनके मनो मष्तिष्क पर प्रभाव डालता है,प्रतियोगिता और बाजारवाद के संक्रमण से आज उपभोक्ताओं को रिझाने हेतु नारी देह का अश्लील प्रदर्शन और निम्न स्तर के संवाद का मीडिया और विज्ञापनों में होड़ जारी है , जो कि गिरी हुई मानसिकता और घटियास्तर का प्रदर्शन है

ऐसे में मार्केटिंग एवं विज्ञापन गुरु 'भारत दाभोलकर' का कर्म और चिंतन मीडिया कर्मी और व्यवसाईयों हेतु प्रेरक उदहारण है , अगर रचनात्मकता और सार्थक प्रयास किये जाये तो वुमन एक्सपोसर और अश्लीलता की जरूरत ही नहीं है ,और जनता तक अपनी बात बड़े साफ़ सुथरे और क्रिएटिव तरीके से रखी जा सकती है, उनके अनुसार जिनकी रचनात्मकता समाप्त हो चुकी है वाही सस्ते तरीके अपनाते ,बात सौ फ़ीसदी सही है , अच्छी सोच और क्रियात्मक द्रष्टिकोण का समाज पर सार्थक प्रभाव पड़ता है और बात दिल को छूती है
उनका ये वंक्तव्य समाज के मीडिया और व्यवसायी वर्ग के लिए बहुत सटीक सन्देश है कि अपने प्रोडक्ट्स का प्रचार -प्रसार बिना अश्लीलता और सस्ते प्रदर्शन और संवादों के भी किया जा सकता है , और समाज में एक सकारात्मक सोच, सही दिशा ,और रचनात्मकता का उदाहरण पेश किया जा सकता है सरकार को भी इस तरह के अश्लील विज्ञापन और प्रदर्शनों पर रोक लगनी चाहिए और सभी को मिलकर सस्ते प्रदर्शन और अश्लीलता से भरपूर गानों ,विज्ञापन और होर्डिंग्स का बहिष्कार करना चाहिए



अनुपमा श्रीवास्तव (अनुश्री),
भोपाल, म.प्र